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भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण चिंतन विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।

Published on: 25 Feb 2026

*भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण चिंतन विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।*


इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय मीरपुर, रेवाड़ी के हिंदी विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पर्यावरण संरक्षण विषय पर एक दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर असीम मिगलानी ने की। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रोफेसर कुलदीप चंद अग्निहोत्री कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे। विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर दिलबाग सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित रहे। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी दिल्ली के हिंदी विभाग के प्रोफेसर नरेंद्र मिश्रा उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता रहे। ‌

इस संगोष्ठी को ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संचालित किया गया । जिसमें देश के 21 राज्यों के 25 विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों से 210 शोध-पत्र प्राप्त हुए। इन्हें अलग-अलग समानांतर रूप से चलाए गए तकनीकी सत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। 

दीप प्रज्वलन एवं विश्वविद्यालय के कुल गीत के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया और आगंतुक मेहमानों को फूलों के गुलदस्ते भेंट करके उनका स्वागत अभिनंदन किया गया। ‌

 संगोष्ठी संयोजिका एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजु पुरी ने सभी का स्वागत किया एवं संगोष्ठी के मूल विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण हमारी प्राचीन परंपरा रही है। दोहन, शोषण और वैभव, विलास की रीति नीति ने पर्यावरण को नष्ट कर दिया है। समाधान के लिए हमें अपनी विरासत को संभालना होगा। हमने इस आयोजन में केवल साहित्य को ही नहीं बल्कि योग वाणिज्य कंप्यूटर साइंस और समाज विज्ञान जैसे विविध विषयों को एक धरातल पर लाने का प्रयास किया है। पर्यावरण चिंतन केवल एक वैज्ञानिक चिंता नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक दायित्व है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर कुलदीप सिंह अग्निहोत्री ने कहा कि अहीरवाल वीरों की धरती है जो रेजांगला जैसे पराक्रम के लिए याद की जाती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में स्थापित यह विश्वविद्यालय आसपास की बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए वरदान साबित हुआ है क्योंकि उन्हें घर से बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर बात करते हुए उन्होंने कहा की हमें अपनी परंपराओं के मूल में जाने और मौलिक सोच रखने की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सभी पौराणिक ग्रंथ संस्कृत में हैं इसलिए सभी विषयों में प्रवीणता तभी हासिल हो सकती है यदि संस्कृत भाषा को मुख्य धारा में शामिल किया जाए और हर विषय के संबंध में अलग-अलग भारतीय ज्ञान परंपराओं को खोजा जाए। मानव सभ्यता के इतिहास में ज्ञान और प्रकृति कभी अलग नहीं रहे।

मुख्य वक्ता प्रोफेसर नरेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का विषय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा संशोधित सभी पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है और इसी प्रकार प्रकृति का संरक्षण करने के लिए पर्यावरण जागरूकता संबंधी विषयों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पाठ्यक्रमों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उन्होंने अपनी पुरानी परंपराओं को याद करते हुए बताया कि हमारे यहां धरती को माता कहा जाता है और हमारे सभी धार्मिक परंपराएं पर्यावरण से जुड़ी हुई है।  

कुलपति प्रोफेसर असीम मिगलानी ने कहा कि आधुनिक विज्ञान जहां पर्यावरण को केवल भौतिक संसाधनों के रूप में देखता है वहीं भारतीय परंपराएं 'माता भूमि: पुत्रोअ्हं पृथिव्या:'अर्थात (भूमि माता है और मैं उसका पुत्र हूं) के भाव को आत्मसात करती है। इन्होंने वेदो और उपनिषदों में वर्णित पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) के महत्व को समझाते वह कहा कि कैसे शांति पाठ के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने समस्त ब्रह्मांड की शुद्धि की कामना की थी। वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति न केवल शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठने के लिए अपितु छात्रों के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए सशक्त मार्गदर्शन प्रदान करती है।

कुलसचिव प्रोफेसर दिलबाग सिंह ने कहा कि भारतीय परंपरा में प्रकृति उपभोग वस्तु नहीं अपितु वंदनीय है। उन्होंने प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दोहराया। पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें अपनी विरासत को संभालना होगा। हम मन, वचन और कर्म से इस सत्य को स्वीकार करें और पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दें।

पर्यावरणविद् डॉ. कुशाग्र राजेंद्र (अमेठी विश्वविद्यालय गुरुग्राम) ने लोकगीतों उत्सव आयुर्वेद में प्रकृति के संरक्षण की बात की उन्होंने बताया कि कैसे पीपल, तुलसी और वट वृक्ष की पूजा के पीछे वैज्ञानिक और परिस्थिति की कारण छिपे होते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है।

संस्कृत आचार्य डॉ. सुमन (केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़) 

सर्वे भवंतु सुखिन की भावना से ओतप्रोत यह परंपरा पारिस्थितिकी संतुलन के लिए सुंदर जीवन शैली और संसाधनों के उपयुक्त उपयोग की शिक्षा देती है। भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है।

तकनीकी सत्राध्यक्ष प्रोफेसर रोमिका ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा केवल कानून से नहीं बल्कि व्यक्ति आचरण और भारतीय संस्कारों से ही संभव है। 

डॉ. विपिन (निदेशक भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में सर्वत्र पेड़ पौधों एवं वनस्पतियों के संरक्षण की बात की गई है, उन्हें नष्ट करने की नहीं। भारतीय जीवन शैली एक ऐसी विरासत है जिसमें पर्यावरण स्वास्थ्य और संस्कृत तीनों का गहरा तालमेल है।

डॉ. भारती ने पढे़ गये शोध पत्रों का समाहार प्रस्तुत करते हुए कहा कि शोध पत्रों के माध्यम से विद्वानों ने राम परंपरा की मर्यादा, आधुनिक प्रबंधन की नैतिकता और योग की चेतना को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर प्रस्तुत किया।

डॉ. रीना ने वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सतत विकास का वास्तविक मॉडल हमारी प्राचीन जीवन शैली में ही निहित है।

कार्यक्रम के समापन सत्र में पर्यावरण संरक्षण संबंधी उत्कृष्ट कार्यो के लिए राजनीतिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ मुकेश यादव एवं प्रबंधन विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉक्टर सुशांत यादव 'पर्यावरण मित्र' सम्मान से सम्मानित भी किया गया।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शकुंतला के द्वारा किया गया। ऑफलाइन कार्यक्रम का संचालन डॉ. जागीर नागर और डॉ. अर्चना के द्वारा तथा ऑफलाइन कार्यक्रम का संचालन डॉ. कविता, डॉ. नेहा, डॉ. नवीन, डॉ. अमनदीप के द्वारा किया गया।

इस अवसर पर अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष, विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से आए हुए प्रतिभागी शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।